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इंसान का बबूला


अँगीठी पर पतीली है

पतीली में पानी है

पानी उबल रहा है

इंसान न पतीली में है

न पतीली अंगीठी पर

पर इंसान उबल रहा है

पानी के उबाल में बनते हुए बबूले

बनते हैं फूटते हैं

अपने अलग होने की घोषणा नहीं करते

बिन अँगीठी पतीली के उबलते इंसान में

बनता बबूला कहता है

वह बाक़ी बबूलों से अलग है

ऐसा हर बबूला समझता है

इंसानी बबूला अलग है

इसलिए अकेला है उदास है

दूसरे बबूले से रास रचाता है

बबूलों वाला रास

बबूले ब्याह रचाते हैं

मिल जुलकर घर बनाते हैं

परिवार बसाते हैं

बबूले अपने ऊपर पड़ती झिलमिल

सूरज की सतरंगी किरणों से

फूले नहीं समाते हैं

इंद्रधनुषी रंगों से रंगमहलों के ख़्वाब सजाते हैं

बबूलों की तिजोरियों होती हैं

उनके अपने गढ़े गाढ़ी

या पतली कमाई के धन होते हैं

ओहदे होते हैं

मान और सम्मान होते हैं

प्रशस्ति पत्र और पुरस्कार होते हैं

बबूले बबूलों से वैर रखते हैं

घृणा करते हैं

प्रतिस्पर्धा करते हैं

दौड़ लगाते हैं

दुःख और शोक के आँसू बहाते हैं

बबूले बबूलों को दबाते हैं

ख़ुद फूलने को औरों को फोड़ते हैं

बबूलों के बबूले गहरे यार होते हैं

जो पल भर में एक दूजे पर पड़ते

अपने अक्सों के कँपने पर

उतने ही गहरे दुश्मन हो जाते हैं

बबूलों के अक्सों में

उनके अपने छोटे बड़े क़द होते हैं

धर्म जाति और धंधे होते हैं

नीति अनीति के मूल्यन अवमूल्यन होते हैं

उनके शोर शराबे और मौन होते हैं

यहाँ की आपाधापी से जब

बबूले ऊब और थक जाते हैं

तब स्वर्ग के ईश्वर के अनीश्वर के

सत्य के असत्य के

धर्म शास्त्र के

निर्वाण और मोक्ष के

पीर पैग़म्बर के

बबूलों में अक्स रचे जाते हैं

इधर बबूले उफनकर फूटते जाते हैं

नए बबूले

वही पुराने बबूलों के काम

दुहराए जाते हैं

कभी कभार ही कोई बबूला

फूटने से पहले

अपने सत को पहचान जाता है

जो न बबूला है

न पानी है न बर्फ न भाप

अँगीठी पर पतीली है

पतीली में पानी है

पानी उबल रहा है

इंसान न पतीली में है

न पतीली अंगीठी पर

न ही इंसान उबल रहा है

वह ‘वह’ है जिसमें

यह उबाल सा लग रहा है


धर्मराज

28 February 2023


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