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खाँड़ कहे मुख मीठा

(इससे बड़ा दुर्भाग्य भला और क्या होगा कि, हमारे पास अंतहीन तर्क वितर्क हैं। ‘विचार’ या ‘मैं’ को संगत-असंगत, शाश्वत-क्षणभंगुर ठहराने का अकूत ज्ञान है। लेकिन ‘मैं’ को जस का तस देखने का रत्ती भर भी कौशल नहीं है।)

…………..इसी आलेख से



अपने जीवन पर ख़तरा समझकर घबराए हुए साँप के उस बच्चे ने, अपनी पूरी क्षमता से उनकी उँगली को डस लिया। भय और क्रोध जैसे न जाने कितने आवेगों ने उसके भीतर के सारे विष को निचोड़कर उनकी रक्त धारा में घोल दिया था।


यात्रा के अंतिम दिन योजना के अनुसार लौटते हुए रास्ते में हमें एक झरने के पास कुछ समय बिताना था। जंगल के बीच में स्थित यह बारहमासी झरना अपनी सुंदरता के लिए दूर दूर के सैलानियों को आकर्षित करता था। काफ़ी ऊँचे से गिरते इस झरने के नीचे कुंड भी बन गया था, जिसमें स्नान करने से प्रायः सैलानी अपने को रोक नहीं पाते थे।


जब हम उस झरने से लौटने ही वाले थे तभी वह मित्र स्नान करने के लिए पानी में उतर गई। हम लोग सरपट पहाड़ पर चढ़ते और वहाँ से जलकुंड में कूदते बच्चों के करतब देखने में व्यस्त थे कि, वहाँ चीख पुकार मच गई। पानी के भीतर साँप के एक छोटे बच्चे ने मित्र को तब बुरी तरह डस लिया, जब वे उसे पकड़कर बाहर निकालने का प्रयत्न कर रही थी।

जब हमारी उनपर निगाह पड़ी तो वे उसे यह कहते हुए पुचकार रही थी कि, “बेटा मैं तुम्हें बाहर निकाल रही हूँ, तुम मुझे काट रहे हो!”

मित्र साँप पकड़ने की कला जानती थी। उन्होंने साँप पाले भी थे, उन्हें उनकी प्रजातियों के विषय में भी खूब ज्ञान था। इसलिए वह निश्चिंत थी। जबकि उनकी हाथ की उँगली से लहू टपक रहा था।

उन्हें लगा था यह पानी का विषहीन साँप है। लेकिन दो मिनट बीतते बीतते उनके पैर काँप गए, वे बैठ गईं। अभी भी उनका अपने ज्ञान पर भरोसा नहीं टूटा था, लेकिन साँप हाथ से उन्होंने छोड़ दिया। उनकी बिगड़ती हालत देख उन्हें आनन फानन में अस्पताल पहुँचाया गया। जहाँ कई दिन ज़िंदगी मौत से जूझने के बाद उनकी जान बची। बाद में पता चला कि वह दुनिया के सबसे ज़हरीले साँपों में से एक रशेल वाइपर था। जो शायद गलती से पानी में गिर गया था।


कैसी विडम्बना है, हमारे जीवन में ‘दुःख’ का ‘मैं’ का विष पूरी तरह से फैल चुका है, और हम सीधे सटीक निदान और उपचार की ओर बढ़ने की बजाय थोथे ज्ञान की जुगाली किए जा रहे हैं।


उन मित्र के पानी वाले साँप के ज्ञान के धोखे ने ही उस विषधर के मुँह में उँगली डाली थी। जिससे उनका जीवन संकट में आया था। लेकिन वह फिर भी ज्ञान बघारती जा रही थी। उनकी देह विषाक्त होती जा रही थी और वह साँप की प्रजाति, वह कहाँ पाया जाता है, वह क्या खाता है, उसे क्या पसंद है, उसका विष कैसे प्रोटीन का एक प्रकार है, कैसे उन्होंने इसके पहले साँप पकड़े और पाले हैं, उन पर ज्ञान दे रही थी। यह तो हम लोगों ने उनके ज्ञान की अवहेलना कर उन्हें अस्पताल पहुँचाया नहीं तो वह जीवन से हाथ धो बैठती।


उन मित्र से अनंत गुना बदतर स्थिति हमारी है। हमारा संकट तो हमारे जीवन का अभिन्न अंग हो चुका है। हमारा अपना निज जीवन, हमारे सम्बंध दुःख और आंसुओं से पटे पड़े हैं। जहाँ जीवन का अनंत सृजनशील प्रवाह बहता है, वहाँ ‘मैं’ की विभाजनकारी बनावटी संरचना डेरा डाले हुए है।

चढ़ते हुए विष से लड़खड़ाती हुई उन मित्र के ख़्याल में कम से कम यह तो था कि, ऐसा शरीर होता है जो विषाक्त नहीं होता। लेकिन हमें तो यह ख़्याल भी खो चुका है कि, ऐसा जीवन होता है जो मैं की ज़हरीली या दुःख की सालती संरचना से सर्वथा मुक्त है।

उन मित्र से हमारी स्थिति इसलिए और भी भयावह है कि, उनके अलावा और लोग थे जिन्हें साँप ने नहीं डसा था। जो उन्हें उनकी मर्ज़ी के बिना अस्पताल ले गए। हमारे बीच तो सभी ‘मैं’ के दंस से विषाक्त हैं। बल्कि विषाक्त ही नहीं मृत ही हो चुके हैं। मृत ही नहीं कृत्रिम हो चुके हैं। मृत होने पर तो जीवन की फिर से उगने की सम्भावना रहती है, कृत्रिम तो अनंत काल तक ऐसे जीता है, जैसे जीवित हो। पर यथार्थ जीवन से उसका दूर दूर तक कोई सरोकार नहीं हैं।


यदि तिल भर भी हम जागरुक हों और इस तथ्य पर हमारी नज़र उठे कि, सब दुर्भाग्य के मूल ‘मैं’ का निर्माण कैसे होता है, तो क्या यह देखते देर लगेगी कि, विचार ही ‘मैं’ का निर्माण कर रहे हैं। विचार ही कृत्रिम रूप से टूटकर विचारक को निर्मित करते हैं। जो इस तरह से निरंतर चलते हैं कि, जीवन में एक स्थाई सत्ता का निर्माण ‘मैं’ के रूप में कर लेते हैं।

विचार का जन्म स्मृति से होता है। जो छवियों, शब्दों, प्रतीकों आदि के रूप में उन घटनाओं को संचित रखती हैं, जो बीत चुकी हैं।

निश्चित ही विचार की अपनी गति है। वह स्मृति से भले पैदा होती है, लेकिन उस क्षेत्र को भी प्रभावित करते हुए घेर लेती है, जो अभी घट रहा होता है। किसी बीती घटना से उपजा वैर, जीवन भर हमारे सम्बंध को प्रभावित करता चलता है। वैर विचार की प्रक्रिया है, पर हमारे अभी के जीवन को सुलगाती चलती है।


वस्तुतः सत्य क्या है, उससे पहले हम यदि ‘जो तथ्य है’ उसका विश्लेषण करें, तो दो भागों में उसे बाँट सकते हैं। पहला वह जो मानव बुद्धि निर्मित नहीं है, दूसरा जो मानव बुद्धि निर्मित है। सारे जंगल, पहाड़, जीव, जंतु जो प्रकृति का हिस्सा हैं, वह मानव बुद्धि निर्मित नहीं हैं।

दूसरा है मानव बुद्धि निर्मित यानि मैं, तुम, राष्ट्र, धर्म, वैर, दुःख, आसक्ति, घृणा, हिंसा यह सब तथ्य हैं, पर मानव बुद्धि निर्मित हैं।

प्रकृति का तथ्य मानव बुद्धि से निर्मित नहीं है, इसलिए देखने जागने समझने मात्र से उसका अंत नहीं हो सकता। ना ही हमारी समस्या प्रकृति है।

हमारी समस्या मानवबुद्धि निर्मित तथ्य हैं। जो चाहे जितने ही प्रभावशाली प्रतीत होते हों, पर समझ मात्र से उनका अवसान हो सकता है।

देखने मात्र से इसलिए अंत हो जाता है, क्यूँकि वह कृत्रिम है। जो बनावटी है, उसी का देखने से अंत हो सकता है न कि, यथार्थ का। वैर की पूरी संरचना स्मृति से जन्म लेती है। स्मृति एक तथ्य है। लेकिन वह शब्द, सूचना, प्रतीक के रूप में तथ्य है, न कि वैसा तथ्य जिसकी वह सूचना शब्द या प्रतीक हैं।

जैसे कल किए हुए भोजन की तृप्ति की मुझे स्मृति है, लेकिन वह स्मृति मेरी आज भूख नहीं मिटा सकती। खाँड़ कहने से हमारा मुँह मीठा नहीं हो सकता।

इसके अतिरिक्त हमारी बुद्धि ऐसे तथ्यों को भी गढ़ती है, जो वास्तव में होते ही नहीं हैं। जैसे राष्ट्र, धर्म, जाति आदि। ऐसे तथ्य ही ‘मैं’ के ‘दुःख’ तिलिस्मी तथ्य के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाते हैं।

यह तिलिस्मी तथ्य चाहे जितना जीवंत दिखे, चाहे जितना जीवन को घेर कर रखें, लेकिन जैसे ही इसको जस का तस देखा जाने लगता है, यह मिट जाता है। साथ ही इस कृत्रिम संरचना में संलग्न ऊर्जा, जो कि मानव निर्मित तथ्य नहीं है, वह भी मुक्त हो जाती है।


लेकिन अब यहाँ सवाल उठता है कि, इतना विचार प्रक्रिया के विश्लेषण की आवश्यकता क्या है? और हम युगों युगों से इस तरह के विश्लेषण के ज्ञान की जुगाली कर पहुँच कहाँ रहे हैं?

कहीं यह ऐसा तो नहीं कि, यह उसी शातिर ‘मैं’ प्रक्रिया की एक चाल है जो इसलिए रची गई है कि, उसे सीधे देखा न जाय! सीधे देखने में इस दुःख की, ‘मैं’ की प्रक्रिया को पता है कि यह उसका अंत है। इसलिए वह निदान के लिए थोथे ज्ञान के रूप में आत्मछल करती है।

सीधे देखना बिल्कुल भी कठिन नहीं है। भला जो है, उसे देखने से सरल क्या होगा। यह तो ज्ञान अथवा ‘मैं’ की प्रक्रिया इसे जटिल बनाती है।


आह! कैसी विडम्बना है कि, देह के साँप द्वारा डसे जाने पर तो कोई दूसरा भी उपचार कर सकता है। लेकिन जब हम स्वयं द्वारा ही डसे गए हों तो कौन उबारे!

साँप का डसा जाना तो फिर भी समझ आ जाता है, यह भला समझ में आए तो आए कैसे कि, इस दुनिया में ठीक से होश में आने से पहले ही मनुष्य का जीवन ‘मैं’ द्वारा डस लिया जा रहा है।

इससे बड़ा दुर्भाग्य भला और क्या होगा कि, हमारे पास अंतहीन तर्क वितर्क हैं। विचार या मैं को संगत-असंगत, शाश्वत-क्षणभंगुर ठहराने का अकूत ज्ञान है। लेकिन ‘मैं’ को जस का तस देखने का रत्ती भर भी कौशल नहीं है।


दुःख और मैं की आँच पर धधक रहे जीवन का जहाँ होशपूर्वक संशलेषण होना चाहिए, वहाँ हम उसका विश्लेषण कर रहे हैं।


धर्मराज

10/08/2021


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