top of page
Image by NordWood Themes
Image by NordWood Themes

न न न वे न हों




मेरी भोर की प्रार्थनाओं में

यदि गहरी से गहरी नींद में बेसुध के भी

परम कल्याण का निवेदन शामिल न हो

न न न वे न स्वीकृत हों

जिस मुक्ति में मैं भर मुक्त होऊँ

कहीं भी कोई तृण भी बंधन में छूटा हो

न न न वह न घट पावे

मेरे असंख्य प्रणामों पर

मेरी ओर बरसते आशीषों में

यदि वह तक भी छूटा जाता हो

जिसने प्रणाम का ढंग ही न जाना हो

न न न ऐसे आशीष उतरें ही न


मेरी जीवन धारा के तोड़े दुःखचक्र से उमड़ी

आनंद की हिलोरें बस मुझ तक आती हों

वह भी जिसे दुःख तक का बोध नहीं

छूटा जाता हो

न न न ऐसा आनंद वापस मुड़ जावे

न आवे

जिस दीपक का उजियारा मेरा भर पथ जगमग कर पावे

मेरे पीछे कोई भी पाँव भटकता रह जावे

न न न ऐसा दीप बुझ जावे

जल ही न पावे


धर्मराज

30/10/2020


1 view0 comments

Komentar


bottom of page