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हर हाल में मुहब्बत ही रहा

Aug 24, 2023
1 min read

जाने कितने सुबूत नफ़रत ने

ख़ुद के होने के दिए

बग़ैर सबूत गवाह

ऐतबार मुहब्बत पर था

मुहब्बत पर ही रहा

होकर मेहबूब

जाने कितने ज़ख़्म

पीठ पर मिले मिलते ही रहे

न जाने कितनी बार बेइंतहा

सरेआम बेइज्जत हुआ

जो भी हो

हुई कितनी भी फिसलन आसाँ

के मेहबूब अब तो सितमगर ठहरे लेकिन

हुआ जो मेहबूब एक बार

फिर वह मेहबूब ही रहा

संगदिल से थी दिल्लगी

के दिल्लगी ही थी संगदिल

कितनी ही बार क़त्ल हुआ

कितनी बार जनाज़े में सजा

ऐतबार ए मुहब्बत पर ऐतबार क्यूँ था

यह राज था

राज ही रहा

वो लाता कहाँ से था

इतनी बेरहमी नाम पर मुहब्बत के

वो जाने

ये दिल मुहब्बत था

हर हाल में मुहब्बत ही रहा

- धर्मराज

13/07/2023


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