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बाढ़न लागी प्रीति नई - कबीर उलटवासी

बाढ़न लागी प्रीति नई

गुरु मोहि जीवन मूर दई।

जल थोड़ा बरषा भई भारी,

छाय रही सब लाल मई।

छिन छिन पाप कटन जब लागे,

बाढ़न लागी प्रीति नई।।

अमरापुर में खेती कीन्ही,

हीरा नग ते भेंट भई।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो,

मन की दुविधा दूर भई।।

गुरु मोहि जीवन मूर दई।


मूर यानी वह मूल मंत्र या कीमिया जो तार दे। कबीर साहब यह बात अपने लिए कह रहे हैं कि एक मित्र ने जीवन का मूल मंत्र दे दिया है, ऐसी कीमिया, ऐसी बूटी दी है, जो तार दे। जल तो बहुत थोड़ा सा था, पर उसने पूरा भिगो दिया। जरा सा ही उस भेद का खुलना होता है और जीवन में लाली, यानी खुशियां ही खुशियां फैल जाती हैं।


एक बार रमन महर्षी से किसी ने पूछा कि क्या आप मुझे बुद्धत्व दे सकते हैं, तो महर्षि ने कहा कि मैं तो दे सकता हूं, पर क्या आप उसको ले सकते हैं? बात यह नहीं है कि बुद्धत्व है कि नहीं है, पर क्या हमारी क्षमता है उसे ग्रहण करने के लिए?


जल तो बहुत थोड़ा सा ही था पर वह बहुत अधिक बरस गया, यह किसी भौतिक विषय के बारे में बात नहीं हो रही है। जैसे आप यह प्रश्न उठाते हैं कि वह जीवन या जीना क्या है जो मैं की भूमिका से मुक्त है?

यह पूरे जीवन को आमूल रूप से रूपांतरित करने का एक रसायन है। रसायन बहुत थोड़ा सा है पर उससे जो क्रांति पैदा होती है, वह बहुत भारी है। यदि इस प्रश्न का कोई उत्तर आया तो उसकी सूचना मुझे नहीं आएगी। शरीर की सहज अवस्था में भी मेरी कोई भूमिका नहीं है।


जो जीवन मैं जीता हूं और जो जीवन मैं के हटने के बाद पाया जाता है, उन दोनों में बुनियादी रूप से बहुत बड़ा अंतर है। जो जीवन में जीता हूं वह बुद्धि द्वारा निर्धारित है, वह आभासीय है। शरीर का जन्म तो प्राकृतिक धरातल पर होता है, लेकिन जो मेरा जन्म होता है वह एक आभासीय धरातल है। मैं के एहसास का जन्म, बुद्धि या चित्त के धरातल पर होता है। चित्त के धरातल पर जो विचार की प्रक्रियाएं चलती हैं, वह मुझे बनाती हैं।


अमोघ प्रश्न गुरु है, इस गुरु से जो हमारे अंदर प्रकाश फैला, वह कहता है कि मैं आभासीय हूं, मैं जो भी करूंगा वह यथार्थ नहीं है। यह आभासीय सत्ता प्रभाव डाल सकती है, पर यह जीवन की गहराई में प्रवेश नहीं कर सकती, कभी उसमें डूब नहीं सकती है। जैसे ही यह अंतर्दृष्टि जीवन में उतरी, तो ठीक उसी जगह पर जहां पर मैं झांसे के रूप में था, ठीक वहीं पर यथार्थ जीवन व्याप्त हो गया। उस अंतर्दृष्टि ने जरा सा प्रकाश डाला, और एक सूरज की तरह वहां प्रकाश फैल गया। आभासीय धरातल भंग हुआ, और वहीं असल धरातल का पसरा होना पाया गया। जीवन के असल धरातल के पाए जाने को कबीर साहब कहते हैं, वर्षा भई भारी। इससे दुख की जो कालिमा फैली हुई है, वह नष्ट हो जाती है, और वहां मुदिता रूपी लालिमा छा जाती है।


कबीर साहब जिस पाप की बात कर रहे हैं वह चोरी और झूठ बोलना आदि नहीं है। कबीर साहब की दृष्टि में जो यथार्थ से वंचित होना है, या जो यथार्थ से उखड़ जाना है, बस वही पाप है। इस अखंड अस्तित्व में जो मैं की एक अलग भूमिका स्थापित होती है, वही पाप है। अस्तित्व के समक्ष मैं की आभासीय संस्था का, या मेरा होना पाप है। यह आभासीय संस्था चाहे पुण्य करे या पाप करे, दोनों बराबर है। इस अस्तित्व पर मेरी अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषणा ही पाप है।


जैसे ही जीवन के मूल में मेरा होना समाप्त हुआ, वैसे ही छिन छिन पाप मिटने लगे। खुद को बनाए रखने की जो सतत जुगत चलती थी, वही पाप है, वह अब क्षण क्षण कटने लगा। यानी पाप के रूप में मेरा होना छिन छिन कटने लगा। जैसे-जैसे मैं मिटाता हूं, वैसे-वैसे नई प्रीति का जन्म होता है। वह रोमांस नहीं जिसको हम नया समझते हैं, पर वह होता बहुत पुराना है। मन में जो कुछ भी चलता है वह लगता है कि नया है, पर होता नहीं है। नई प्रीति का अर्थ है जहां पर मैं नहीं हूं। जहां पर मेरी कोई भूमिका नहीं है, वहां पर जो जीवन घटता है, वही सत्य है और वही प्रेम में डूबा हुआ है। जहां मैं नहीं हूं, वहां प्रेम है।


कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाँहि।

सीस उतारै हाथि करि, सो पैठे घर माँहि॥


यह प्रेम का घर है यहां पर सर को जमीन पर रखिए, यह कोई मौसी का घर नहीं है, कि जब चाहा मुंह उठाए चले आए, कि जब चाहे प्रेम कर लिया और जब चाहे प्रेम संबंध तोड़ दिया, या किसी के साथ प्रेम का संबंध बनाए रखने का प्रयास चल रहा है, यह सब प्रेम नहीं है। हमारा प्रेम बहुत सारी शर्तों पर टिका होता है, इसीलिए वह बढ़ता नहीं है। यानी जहां मैं नहीं हूं, वहां नया प्रेम बढ़ने लगा।


अमरापुर का अर्थ है, कोई ऐसा स्थान जहां पर मृत्यु नहीं होती है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है। जो भी मैं सोच या समझ सकता हूं वह सब मरण धर्मा है; यह सोचने या समझने वाला खुद मरण धर्मा है। रात को सोने से ही हमारी सारी चालाकी, सारी सोच समझ, लुप्त हो जाती है।


यह संसार मरण धर्मा नहीं है, यहां पर चीजें बदलती हैं, मरती नहीं हैं; चित्त मरण धर्मा है। मन कभी भी जीवित नहीं रहा, वही मरापुर है। मन एक आभासीय धरातल है, इसमें जो भी खेती करी जाएगी, वह कभी भी जीवित नहीं हो सकती है। हम चाहे कितनी भीड़ जुटा लें, चाहे कितने शास्त्रों को प्रस्तुत कर दें, लेकिन जो भी चीज मरापुर से समझी जाती है, उसमें कभी भी प्रेम रूपी नग नहीं मिल सकता है। इस मरापुर मैं को कभी भी कुछ अनमोल नहीं मिल सकता है। जो भी चीज दिखाई पड़ती है, उसकी जो भी व्याख्या होती है, वह सच नहीं है, वह बासी है, वह मरी हुई ही है। वह पहाड़ जो ठीक सामने है, उसकी जो भी व्याख्या मरापुर में चल रही है, वह सच नहीं हो सकती है।


जब हम सवाल उठाते हैं, क्या कुछ ऐसा जीना है जो मेरी या मन की भूमिका से मुक्त है? यदि इस प्रश्न के साथ न्याय हुआ, तो वहां पर जिस जमीन का जन्म होगा, वह जमीन अमरापुर है। यानी जो ध्यान बिना मेरे प्रयास के जन्म लेता है, वह होश जो जीवन में व्याप्त होता है, जिसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है, वह अमरापुर की फसल है। यहीं से "अनमोल" जीवन में पाया जाता है।


विधा का मतलब होता है ढंग या तरीका, और मन का मतलब है दुविधा। मन हमेशा दो में चलता है, एक होने का मतलब है मन का भंग हो जाना। आप अपने मन में एकांगी चीज की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। आप जो भी कल्पना करेंगे उसके उदय में ही उसका अंत भी शामिल है। विचार के जन्म में ही उसकी मृत्यु भी शामिल है। जैसे ही मन के उस पार की एक झलक आनी शुरू हुई, वैसे ही मन से दुविधा दूर होने लगी, जीवन से द्वैत समाप्त होने लगा। जो असल है उसमें दो नहीं होता, मेरा जन्म ही तब होता है, जब तू सामने होता है। यदि दूसरा नहीं है, तो मैं भी नहीं हो सकता है, मेरा होना ही दुविधा है।


मैं जब कहता हूं कि मुझे अनुभव हो रहा है, तो उसमें अनुभवकर्ता एक छोर है और जिसका अनुभव हो रहा है वह दूसरा छोर है। वैसे ही सोचने वाला एक छोर है और जो सोचा जा रहा है वह दूसरा छोर है। जीवन की बूटी से मुझ दुविधा का अंत हुआ, इस थोड़े से इशारे से जीवन से सब तरह के क्लेश, संताप, दुर्भाग्य, शोक समाप्त हुए।


असंभव प्रश्न में जिस दिन प्रश्न के साथ तुम समाप्त हो जाते हो उस दिन उत्तर घटेगा। उत्तर तो घटा ही हुआ है, प्रश्न के साथ मेरी पूरी भूमिका के मिट जाने की देर है।


वह जो मेरे बिना प्रेम का जन्म हुआ है, वह बड़ी तेजी से फैल रहा है और नित नूतन है, यानी वह समय के पार है; जो भी चीज समय में है वह बासी हो जाती है, यानी वह प्रेम अकाल है, कालातीत है। इतनी सी बात यदि हम समझ पाए, तो जीवन में ऐसी मूसलाधार बारिश होगी कि सारे पाप धुल जाते हैं। जब कोई उत्तर नहीं आता है, तो प्रश्न का बीज अपनी गति में अंकुरित होता है।

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