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प्रेय और एक श्रेय (सुबह का सत्र, 22 जनवरी 2024)

प्रेय और एक श्रेय (सुबह का सत्र, 22 जनवरी 2024)

एक राजा ने सुना की बहुत दूर एक झरना है, जो उसका पानी पीता है वो अमर हो जाता है। पर उस झरने तक पहुंचने का रास्ता बहुत दुर्गम है, उस तक रेगिस्तान और जंगल पार कर के जाना पड़ता है, और अंत में एक गुफा के अंदर वो झरना है। बड़ी मुश्किलों के बाद वह वहां अकेला पहुंच पाया, जब वो पानी पीने लगा तो एक बहुत ही बूढ़े कौए की आवाज आई कि मैं तुम्हें सावधान करता हूं इसको मत पियो। तुम मरोगे नहीं पर तुम्हारा शरीर बूढ़ा हो जायेगा, बाकी सब मर जायेंगे, तुम चाहोगे भी तो भी मर नहीं पाओगे, मेरी भी यही कहानी है।


चित्त के दो ढंग हैं होते हैं एक महत्वकांक्षा का और एक विवेक का, यानी चित्त के दो स्वरूप हैं एक प्रेय और एक श्रेय का। हम ऐसे जीते हैं जैसे हम सदा ही यहां रहने वाले हैं। माइकल जैक्सन के कितने ही अंग के लिए अलग अलग डॉक्टर थे, पर फिर भी वो ५१ की उम्र में ही मर गया था। प्रेेय मार्ग पर हम रुपया, मान सम्मान इकठ्ठा करते हैं कि हम मरे नहीं, हम मानसिक रूप से भी कई उपाय करते हैं। कोई परिवार का आश्रय लेता है, कोई आश्रम बनाता है, शिष्य आदि बनाते हैं, ताकि हम बने रहें।

हम सब अमृत खोज रहे हैं, पर हम यंत्र मानव या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का धीरे धीरे ग्रास बनने जा रहे हैं।


श्रेय मार्ग थोड़ा होशियार है, जैसे वो विवेक बूढ़े कौए की तरह है, जो थोड़ा सावधान करता है। हम बनावटी जीवन को प्राप्त हैं, अमर हो जाना महा दुर्भाग्य है। यदि यांत्रिकता बहुत ज्यादा हमपर हावी हो गई तो अज्ञेय, प्रेम में डूबने की हमारी संभावना हमेशा के लिए समाप्त हो जायेगी।


विवेक ने बहुत कुछ जुटाया है। विवके के भी तन बदलते रहे पर वह भी मर ही नहीं पाता है। जैसे कौए ने कहा कि मैं मर ही नहीं पाता हूं, मैं की मृत्यु परम सौभाग्य है।


मरो वै जोगी मरौ, मरण है मीठा।

मरणी मरौ जिस मरणी, गोरख मरि दीठा॥


अर्थ - हे योगी! तुम मरो। मरने से आनंद मिलता है। तुम उसी प्रकार मरो, जिस मृत्यु से गोरख ने मरकर ब्रह्म को देखा है। अर्थात् हे योगी! तुम संसार से विरक्त हो जाओ, इस विरक्ति में आनंद है। तुम उसी प्रकार की विरक्ति प्राप्त करो जैसी गोरख ने प्राप्त की है।


मृत्यु के साथ जीना ऐसे है यानी जीवन में अमृत उतरने लगा। क्या हम जो कुछ भी अभी है उसके साथ समाप्त हो सकते हैं? इसी क्षण, यदि मृत्यु आए तो बचने का विचार ना आए, पूरी ऊर्जा अभी घुल जाए।

कथा है कि त्रिशंकु अपने शरीर को बचाए रखने की इच्छा के कारण अभी भी अधर में ही है।


अभी जीवन है और साथ ही अभी ही मृत्यु भी है, इससे जीवन में अमृत सरकने लगता है। आपका क्षमा नहीं करना, आपके भविष्य को दिखाता है। आप माफी नहीं मांग रहे हो क्योंकि आप अपनी छवि को बनाए रखना चाहते हो। अगर भविष्य ही नहीं है तो बैर, आसक्ति, क्रोध, लोभ, चालाकी सब समाप्त हो जायेगा। शमशान घाट को गांव के बाहर नहीं बीच में बनाते, तो उससे मृत्यु का आभास तो रहता। यांत्रिकता, खुशी पाने की उम्मीद हमें सम्मोहित कर देती है।


एक मित्र थीं, जिनके पास बहुत पैसा था। उन्होंने एक नया घर बनाया और मुझसे पूछा कि क्या जो घर में काम करने के लिए आयेगी वो क्या झाड़ू पोंछा अपने घर से साथ लेकर के आयेगी। जब मैंने उनको कहा कि यह क्या बेतुकी सी बात है, तो उन्होंने कहा कि मेरे गुरु ने कहा है कि मेरा ब्रह्म रंध खुल गया है, और मुझे अब केवल शून्य नजर आता है, इसलिए मुझे कभी-कभी पता नहीं चलता कि मैं क्या कह रही हूं। यह सब बड़े धोखे हैं, एक तरफ संसार में इतना मोह, आसक्ति है, और दूसरी तरफ कहते हैं कि मेरा ब्रह्म रंध खुला हुआ है।


हम भी यही करते हैं कि थोड़ा और पैसा बचा लें, ये झांसा कैसे पैदा हो रहा है? जब आप चाहते हो की आपका ब्रह्म रंध खुल जाए, तो कोई ना कोई उसका आश्वासन दे ही देगा और आपका ब्रह्म रंध खोल देगा। यह सब धोखाधड़ी है।


कहीं अनबन हुई और वहीं उसका अंत भी हो जाए, कौन है जो चोटिल हुआ है? जीवन घटा और वह यहीं समाप्त हो जाए, क्या मरेगा? जीवन जन्म मरण के पार चला गया। कुछ निरंतर नहीं बना रहेगा, और साथ ही सब कुछ अटूट है। आगे या भविष्य जैसी कोई घटना ही नहीं है, और वह स्वीकार है जिसमें कोई जोड़ ही नहीं है। अखंड स्वीकार अमृत है, वो स्वीकार मैं नहीं कर सकता, मैं उसमें आता जाता है। खुद का अंत होना, यानी अमृत को अवसर देना।


विवेक अपनी धीमी आवाज से संकेत कर रहा है, परिपूर्ण रूप से अंत के साथ जीना क्या है? उत्तर नहीं आएगा, उत्तर आता है तो आप जैसे एक दलाल नियुक्त कर रहे हैं। आप जानना चाहते हैं कि दुख से मुक्ति कैसे हो, इसका उत्तर विचार में आता है तो वो एक दलाल है। दुख से मुक्त होने के लिए लोग शराब, यौन क्रिया, आदि में उतरते हैं, क्योंकि आपने समाधान के लिए एक ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया है, जो आपको जानता ही नहीं है। अमोघ प्रश्र का कोई भी उत्तर, विचार रूपी दलाल ही ले कर के आता है।


दलाल को आपने जीवन से खारिज कर दीजिए, मैं से मुक्त जीना क्या है? दलाल खुद भी बना रहता है और आपको भी बनाए रखेगा। बिना दलाल के एक्सप्लोर करते हैं, कि मैं से मुक्त जीना क्या है? विवेक ने इस पूरी प्रक्रिया को छीन लिया, तो वहीं बात समाप्त हो गई।


साधु से किसीने पूछा कि तुम्हारा नाम, जाति, घर, कुल, गांव कहां है?


जाती हमारी प्रेम है, माता पिता है राम।

गृह हमारा सुन्न में, अनहद में विश्राम।।


मैं जब छीन लिया गया तो वही प्रेम है, मैं की जाति ही घृणा, द्वेष, द्वंद, दुख है। "रमते इति रामा", जिसमें यह जगत भासित होता है, वह राम है। प्रश्न उठाने पर कहां जाकर आप टिकते हो, कोई उत्तर नहीं आता, वही शून्य है। जिसमें कोई हद नहीं है वहां विश्राम है। कोई गांव नहीं होता, सभी गांव काल्पनिक हैं, यह धरती अखंड है।


अंत के साथ जीना क्या है, अभी और यहीं समाप्त हो जाऊं तो भी राजी है। ये विचार बिलकुल नहीं है कि एक पल और जी लेता। यह और जीने की चाह, आपकी इच्छा आपकी आकांक्षा, ही आपको प्रसाद से वंचित कर देते हैं।


क्या आप मृत्यु के साथ जी रहे हैं? इस बारे में अपने आप को बिल्कुल भी धोखा मत दीजिए। तथ्यों के साथ यदि कल्पना को डाला तो चूक जायेंगे। जहां भी निष्ठा है, उसे बिलकुल भी बदलिए मत। मृत्यु के साथ जीना क्या है, उस अंत के साथ जो शुभ होना होगा, वो हो जायेगा। जैसा भी मैं जी रहा हूं, उसमें अंत के साथ जीना क्या है?

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Ashu Shinghal

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