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Satsang - 9 april, 2023

आत्मदीप और आत्मतम - By Ashwin




१) क्या ऐसा कोई अवलोकन है, जो मेरे द्वारा नहीं किया जा रहा है। जिसमें अवलोकन करने वाला ना हो।


सारे दुखों का स्रोत आभासी मैं है, तो इस आभासी मैं को दूर करने का उपाय क्या है? यदि इस उपाय में आपने इसी मैं को साक्षी बना दिया, तो कोई निदान नहीं निकल सकता है। अहंकार ही दुख का कारण है, तो उसे हटाने के लिए मैं कुछ नहीं कर सक


ता हूं, चाहे मैं साक्षी ही क्यों ना बन जाऊं। जब तक मैं है, तब तक निर्विकल्प जागरण समझ आना संभव नहीं है।


२) एक तरफ अहंकार सारे प्रमाद का कारण है, यानि आत्मतम है, उसके विपरीत आत्मदीप है। लेकिन आत्मतम में एक संभावना है आत्मदीप को अवसर देने की। आत्मतम कभी भी आत्मदीप नहीं हो सकता है, लेकिन वो अपनी सीमा पहचान सकता है। उसी पहचानने में वो जागरण है, जो किसी केंद्र से विकसित नहीं है, जो मैं नहीं करता, जो केवल जीवन में सहज उतरता है।


आत्मतम एक सोच विचार का परिणाम है, यह एक यांत्रिक संरचना है, इसमें कुछ भी किया जायेगा ये संरचना यंत्रवत ही चलेगी। ये जानकर की मैं ध्यान कदापि नहीं कर सकता हूं, ध्यान, होश, जागरण को अवसर देना है। जो हमने अपने जीवन में एक व्यवस्था बनाई हुई है वो व्यवस्था अवास्तविक है, वह सच नहीं है। हमारे अंदर की सोच विचार की प्रक्रिया अपना प्रबंधक चुनने में सक्षम है। वो विचार ही है जो मैं का काम कर रहा है, और वही कह रहा है कि मैं साक्षी हूं।


३) यहां से असंभव प्रश्न की भूमिका है। क्या कोई ऐसा देखना है जो मैं नहीं कर रहा हूं, जिसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है। मैं और विचार एक ही हैं, मैं विचार होकर अपने आप को कुछ जो समझ रहा है, वो एक भ्रामक प्रक्रिया है। विचार का चलना, और उसमें मैं का एहसास है, और ये उसका सारा सभा मंडल ये पूरी संरचना कुत्रिम है। ये कहना की मैं शाश्वत हूं, सनातन हूं, ये झूठ है।


जैसे ही ये जाना जाता है की मैं ध्यान नहीं कर सकता हूं, क्योंकि ध्यान करना भी इस मैं को पुष्ठ करने की ही एक प्रक्रिया ही होगी, तो तत् क्षण जागरण को एक अवसर मिल जाता है। वह सुनना क्या है जो मैं नहीं कर रहा हूं, जो बिना सुनने वाले के है, या जो बिना प्रतिक्रिया के है, तो आप पाएंगे की सुनने की पूरी गतिविधि में अपने आप जागरण को अवसर मिलना शुरू हो जाता है।


जागरण को अवसर देना आत्मदीप भव है, ध्यान है, ना की यह कहना की मैं जागा हूं। मेरे रूप में जो एक दीवार बनी हुई थी जीवन में वो ढह गई। इस दीवार के ढहने से जो निर्व्यक्तिक जागरण, प्रकाश है, वो काम करने लगता है। यहां से आत्मदीप भव का जीवन में प्रवेश होता है। यही निर्विकल्प समर्पण, जागरण, स्वीकार, और ध्यान है। जैसे ही यह समझ आया की मैं कुछ नहीं कर सकता हूं, ध्यान घटना शुरू हो गया। समर्पण और ध्यान ये एक ही चीज के दो नाम हैं।


४) आप अपना जीवन अच्छा बना सकते हैं, ये संभव नहीं है, क्योंकि आप संस्कारों से यंत्रवत संचालित हैं। जो आप समझते हैं कि मैं कर रहा हूं, वो पुराने संस्कार आपसे करवा रहे हैं। मैं एक यांत्रिक संरचना है ये देखने में ही जागरण को अवसर देना है। यदि कोई वास्तव में विचार शून्य होगा, तो ये उसको पता नहीं चलेगा। जिसे आनंद का पता चल रहा है वो बड़े खतरे में है, मुझे आनंद का पता नहीं चल सकता है।


५) सविकल्प जागरण आत्मतम जैसा है, निर्विकल्प जागरण आत्मदीप जैसा है। सविकल्प जागरण में आप विकल्पों के प्रति खूब जागे हुए हैं। जैसे ही आपने एक सिरा निर्मित किया, दूसरा मेरे भीतर चुनने वाले का निर्माण अपने आप हो गया। सविकल्प जागरण यानि अपने जीवन में चुन चुन के जागना, जैसे आप अपने बेटे के प्रति खूब जागे हुए हैं। इसके विपरित यदि आप एक अच्छे आदमी बन जाओगे तो उसमें भी खतरा है।


अच्छा बुरा, कामी ब्रह्मचारी, निंदा स्तुति आदि ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसमें कोई जीवन नहीं है, ये मन, धारणाओं या मान्यताओं के खेल हैं। जीवन में कुछ भी जीत हार जैसा कहीं है ही नहीं। बुरे को छोड़कर अच्छे को चुनना, ये भी एक फिजूल की बात है।


यदि आपने चुनाव नहीं किया तो आपके अंदर दूसरा छोर बनेगा ही नहीं, बाहर यदि निर्विकल्प है तो भीतर भी निर्विकल्प है। जबकि जीवन जो है, वो संपूर्ण अस्तित्व का जीवन है। वो कैसा भी जीवन सिद्ध करा दे, कोई फिक्र नहीं है। उसने ही एक ज्योत जलाई है जिसने कहा जागो, जागरण को अवसर दो। बुरे को विदा करने का प्रयास ना करो, और अच्छे का आवाह्न मत करो। कुछ अच्छा आए तो जागरण को अवसर देना, कुछ बुरा आए तो भी जागरण को अवसर देना है। ये द्वंद चला जायेगा तो तुम्हारे रहने का भी कोई आधार नहीं रहेगा, और जो रहेगा वो परमात्मा ही तो है।


६) आप जब सवाल उठाते हैं कि वो सुनना क्या है जो मैं नहीं कर रहा हूं, तो तत्क्षण आपकी भूमिका समाप्त हो गई। ऐसे में जीवन का मर्म उदय होता है, और जो व्यर्थ है वो गिर जाता है। कुछ करने की आवश्यकता नहीं है, सुनने में ही यदि वो सार्थक है तो उसका अर्थ प्रकट हुआ और वो जीवन में घुल गया।


ऐसा नहीं है कि बहुत सारे भागों को, मैं को या मन को मिलाकर के ये अस्तित्व बना है। इस अखंड अस्तित्व में मैं का भासना झूठ है, सोच विचार का परिणाम है, और यह समझना ध्यान का प्रारंभ है। मैं ध्यान नहीं कर सकता, जब मैं की मिथ्या समझ आती है तो ध्यान जीवन में घटने लगता है। मैं सृष्टि का भाग नहीं हूं, और ना ही सृष्टि से भिन्न हूं, ये दोनों बातें यदि समझ आ गईं तो मेरी भूमिका वहीं पर समाप्त हो जाती है।


७) अस्तित्व में विभिन्नता है, विभाजन नहीं है, हर विभाजन मैं का उत्पाद है। जीवन में परेशानी हो सकती है, पर दुख नहीं होगा।


अवसाद का भाव गहन अहंकार को पुष्टि देता है। अवसाद यानि जैसा आप चाहते हैं वैसा जीवन नहीं है। यदि आप समझते हैं कि परिवार ही एक मात्र संबंध है, आप अवसाद में हैं। धन से समृद्धि नहीं आ सकती है, धन हो सकता है लेकिन ये भी है कि अंदर दीनता बनी हुई है।


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