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मुहब्बत की आयत

May 10, 2023
1 min read

मुहब्बत की आख़िरी

और पहली आयत से

कुल हमने इतना सबक़ सीखा

कि बस पोंछ दो खुद को जहाँ तक भी यार के मुमकिन कदम पड़ें

फिर निगाहों को समेट लिया

कि यार को उतना भी कम क्यूँ दिखे

जितना नज़र आता मेरे दिखने में है

मन की सारी पींगें उलीच दी

कि उतना भी कम क्यूँ यार झूले

जितनी पींगें खर्च होती मेरे मन में है

बटोर दी कुआँरे दिल की

सारी ख्वाहिशें

कि यार की उतनी भी ख्वाहिशें क्यूँ कम पूरी हों

जो पूरी होने वाली मेरे दिल से हैं

यार के लिए खुद को पोंछ दिया

कि उतना भी क्यूँ कम पड़े

यार का होना

जितना होना मेरे अपने होने में है

फिर यार को भी मिट जाने दिया

कि यार बसता रहे उस गाँव

जो पार

होने न होने के है

जो भी कर सका

बखूबी किया

पर यार को पता चलने न दिया

आख़िर यार को पता चलना

इतना भी क्यूँ कम हो

जो खपता उसका मुझे जान लेने में है

धर्मराज

22 December 2021


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