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आप हर बात मैं पर ही क्यों ले आते हैं? एक आत्मज्ञानी की दृष्टि (सांझ का सत्र, 9 जनवरी 2024)

सांझ का सत्र, 9 जनवरी 2024


प्रश्न - प्रेम और होश एक कैसे हैं?


जब आप किसी से प्रेम में होते हैं तो कभी ऐसा लगता है कि जैसे समय रुक गया है, उसकी उपस्थिति में डूबे हैं। और होश यानी जो है उसके प्रति उपस्थित होना, जो असत्य है उससे वास्तविकता में डूबना, या जो उखड़ा हुआ जीवन है उसका असल के करीब आ जाना। इसलिए दोनों एक ही हैं।


क्या ऐसा नहीं हो सकता की हम उखड़े ही ना? हम अनुपस्थित होते ही क्यों हैं? अनुपस्थिति का अंत होने में प्रेम और ध्यान एक ही हो जाते हैं। मौलिक बात है कि उपस्थिति को अवसर दे देना, मैं अनुपस्थिति का ही दूसरा नाम है। मैं निकटतम पहुंच सकता है, पर मैं कभी उपस्थित नहीं हो सकता, उपस्थिति पहले है अहंकार बाद में पैदा होता है। उपस्थिति ने ही मैं को जन्म दिया है। बस इतना जान लेना ही बुद्धत्व है। उपस्थिति या केवल होना मात्र ही जीवन या होश है।


प्रेम और ध्यान एक ही घटना है, उपस्थिति में कभी भी दो नहीं होते हैं। प्रेम अद्वैत का दूसरा नाम है, उपस्थिति में अकारण आनंद पाया जाता है, और शोक नहीं हो सकता है। प्रेम में आप रोएं रोएं से जाग जाते हैं, एक अद्भुत दायित्व को महसूस करते हैं। ध्यान अंतर्दृष्टि की परछाई है।


प्रश्न - आप हर बात मैं पर ही क्यों ले आते हैं?


हमें मान प्रतिष्ठा जुटाने का बहुत चार्म होता है। पाउलो कोएल्हो की किताब में एक कहानी है। एक बार शैतान ने सम सामयिक होने के लिए हथियार को मांजना शुरू किया और उनको बेचने के लिए रखा। जो उपस्थिति मात्र से भटकाए वो शैतान का हथियार ही होता है। पैसा, होशियारी, अपनी नियत छिपाना आदि सभी शैतान के हथियार हैं। दो हथियारों का दाम बहुत ज्यादा था, वो बहुत पुराने थे, और वह हमेशा सही काम करते थे, वो हैं संदेह और हीन भावना।


किसी भी कला, संगीत, या वीणा बजाने में आप उपस्थिति के नजदीक आ जाते हो। एक युवक जिसने बहुत कुछ जीवन में पाया था, उससे किसी ने कहा कि तुमने जीवन व्यर्थ गंवा दिया, तुम अपने सच को नहीं जानते हो तो किसी भी कला की सार्थकता ही क्या है। वह समझ गया कि मैं तो मरण धर्मा हूं, छलनी से पानी भरने का प्रयास कर रहा था, और जुटाना किसके लिए चाहिए, जब कोई व्यक्ति ही नहीं है यहां। वह समझ गया कि उसके सभी उपायों में एक झांसा सा चलता था, उसका सारा परिश्रम व्यर्थ गया। जीवन को किसी भी क्रिया कलाप की जरूरत नहीं है, जीवन स्वयंभू है वो पैसे का करेगा क्या? इसलिए बात हमेशा मैं पर ही आएगी।


कौन है जो हित करता है? सांसे प्रसाद हैं, खून का बनना, देखना, सुनना, सोचना मुफ्त में मिला हुआ है। हमें बस कब्जाना और कब्ज या कब्जे को छोड़ना। हम प्रेम नहीं कर सकते हैं, प्रेम ने हमको किया या धरा हुआ है।


यदि आपसे कुछ भी अहम भाव से हुआ है, चाहे आपने किसी की मदद ही क्यों न करी हो, तो आपने उसको छोटा बना दिया और वो कभी ना कभी इसका बदला जरूर लेगा।


हम आप बीच से हटें तो ही हित हो सकता है, जब आप नहीं होते हैं तो हित घटता है, जबकि हित करने का एहसास होना ही एक गाली है। शिष्य गुरु का डुबो देता है और गुरु शिष्य को डुबो देता है, यदि वहां पर कर्ता भाव बचा रह गया कि मैंने तुम्हारे को कुछ सिखाया, या मैंने आपसे कुछ सीखा।


व्यक्ति कभी किसी का हित नहीं कर सकता है, व्यक्ति है तो अंतर्दृष्टि पैदा ही नहीं हो सकती है। जब यह जान लिया कि मैं ही सीमित हूं तो अंतर्दृष्टि घट सकती है।


खूब खांड है खीचड़ी, माहि पड्याँ टुक लूण।

देख पराई चूपड़ी, जी ललचावे कौन॥

खूब खांड है खीचड़ी, माहि पड्याँ टुक लूण।

पेड़ा रोटी खाइ करि, गल कटावे कूण।।

नमक अंतर्दृष्टि है, जीवन खिचड़ी है।


बाहर से सब कुछ बहुत अच्छा दिखता है पर सब काल की रेत में ही समा रहा है। जो अभी मीत है वही सबसे बड़ा बैरी हो जाता है, वही सबसे बड़ी चोट दे सकता है। किसी भी तरह की होशियारी कब्र में ही ले जाती है। जो भी हो रहा है उसको अंतर्दृष्टि के नमक में ले आईए।


यदि प्रेम ध्यान से आता है, तो उससे सम्मोहन नहीं होता है।


सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग।

बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग॥


सद्गुरु ने मुझ पर प्रसन्न होकर एक रसपूर्ण वार्ता सुनाई जिससे प्रेम रस की वर्षा हुई और मेरे अंग-प्रत्यंग उस रस से भीग गए।


मेरी उपस्थिति ही प्रेम के प्रसाद के लिए बाधा है। प्रेम है तो पांव थिरक थिरक उठते हैं, उसमें हर पल मृत्यु के साथ जीना होता है, हर क्षण मृत्यु है और केवल उपस्थिति ही अमृत है।


अभी तक जितने भी मनुष्य हुए हैं उनमें मैं कॉमन नहीं है, वो आता जाता रहता है। केवल उपस्थिति या मौजूदगी कॉमन है, मौजूदगी पर सब कुछ घटता है। क्या मरने के लिए हम राजी हैं? सीधे काल की आंखों में झांक कर देखिए, आपका क्या है जो छीना जा सकता है? जो छीना जा सकता है वह अभी छिन जाए तो बहुत अच्छा उसमें देरी क्यों, उससे डर कैसा? कहीं भागिए नहीं, बिलकुल निर्भय रहिए। प्रेम में निष्ठावान रहिए, अकारण प्रेम ही उपस्थिति है। प्रेम है तो कभी भी पछतावा नहीं हो सकता है, प्रेम में दूसरे से कुछ लेना देना ही नहीं है।


ईमानदारी प्रेम की परछाई है उससे जीवन में भीना भीना रस सा बहता है।


यदि उपकार करने की भावना है, तो किसी की मदद मत करिए, उपकार मत कीजिए। बुद्ध ने अस्पताल नहीं खोले, बल्कि होश जगाया। उपकार तो गाड़ी के पहिए के निशान की तरह हो जाए तो अच्छा, पर वहां करने वाला कोई नहीं होता और वह उपकार जैसा लगेगा भी नहीं। जो सही में दान करते हैं, उनके कभी ख्याल में भी नहीं आता कि उन्होंने दान किया है। जागरण को अवसर देने में चुपचाप कुछ घट जाए वही शुभ है। हमारा स्वभाव ही है कि अबाध बहें।


रहिमन वे नर मर चुके, जो कहुँ माँगन जाहिं।

उनते पहले वे मरे, जिन मुख निकसत नाहिं।।


रहीम साहब कहते हैं कि वे नर मर चुके हैं, जो कहीं कुछ माँगने जाते हैं। माँगने से मनुष्य का मान-गौरव नीचे गिर जाता है।


लेकिन, उनके भी पहले वे नर मर चुके हैं, जो माँगने पर नहीं कह देते हैं। अर्थात यदि किसी ने विवशतावश कुछ माँग ही दिया है तो उसे दे देना चाहिए।


देनहार कोई और है, देवत है दिन रैन।

लोग भरम हम पर करें, याते नीचे नैन॥


देने वाला तो कोई और है, जो दिन रात दे रहे हैं। लेकिन लोग समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ, इसलिये मेरी आँखें अनायास ही शर्म से झुक जाती हैं।


मैं नैतिक व्यक्ति नहीं रहा, लेकिन मैं कभी भी अनैतिक भी नहीं रहा। नीति की व्यर्थता देखी, जागा हुआ था, और किसी शिक्षा के खांचे में नहीं रहा। चाहे जो भी कुछ घटता हो निर्विकल्प स्वीकार को अवसर दिए रहना। अब अपनी भूमिका ही समाप्त हो गई, मैं हूं ही नहीं। यदि गई हुई सांस वापस नहीं आती है तो यह विचार नहीं आयेगा की क्यों नहीं आई, कि एक बार वापस आ जाती तो अच्छा रहता। धर्म नीति नहीं है।


सरल, भोलापन और हृदय में सफाई है तो सीधे दिखता है। पहले कहा जाता था कि उपनिषद सब नहीं सुनें, अधिकतर उपनिषद सुनकर उसका गलत ही अर्थ निकाल लेते हैं, और ऐसा व्यक्ति आत्मघात कर सकता है। उपनिषद तो क्षण क्षण दिखने या घटने की बात है।


यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥

यह चार्वाक ऋषि का भौतिकवादी दर्शन है।


इस श्लोक का अर्थ है - जबतक जीवन है सुख पूर्वक जीना चाहिए, चाहे इसके लिए ऋण लेकर भी घी पीना पड़े तो पीना चाहिए। जब मरने के पश्चात शरीर नष्ट हो कर राख बन जाता है तो मनुष्य का फिर से आना (पूनर्जन्म) कैसे संभव हो सकता है। अतः जब तक जीवन है उसे पूरी तरह खुलकर खुब मस्ती के साथ जीना चाहिए।


इसका भी लोगों ने गलत अर्थ निकाल लिया, जो आत्म तृप्त है वो घी से खुश कैसे होगा? कुछ भी अर्थ निकालने से पहले परिपक्वता होनी चाहिए। ओशो ऋषि हैं हम उनको कुछ समझ ही नहीं पाए, वो अपने जीवन काल में दस हजार बुद्ध देखना चाहते थे। हमारी बुद्धि आंकड़ों से ही चलना जानती है।


निपट उत्तरदायित्व आपका खुद का है, जीवन अलौकिक करते चलें। जब वो विवेकानंद जी के कहने पर काली से अपने दुख का इलाज मांगने के लिए गए, तो रामकृष्ण जी ने बताया कि काली ने कहा है एक ही गला थोड़े ही है, सभी गले तुम्हारे ही तो हैं। मनुष्य चेतना एक नया रहस्य सीख रही है, यथासंभव अपनी चालबाजी और अशुभ से दूर रहिए। कुछ शुभ दिखा है तो इसमें टिकिए, अपने प्रति पूरी तरह से जिम्मेदार रहिए, और झूठ मत बोलिए। यदि आप अपनी तरफ घूम रहे हैं तो आपके पीछे उपस्थिति निकट है, सावधान रहिए उसके प्रति सजग रहिए। सावधानी और सजगता की अपनी एक अलग मौज है।


यदि ध्यान उतरा है तो आसपास घटना शुरू हो जाएगा, आपको नोटिस किया जा सकता है या आपको कोई बिलकुल देख ही नहीं पाए, जैसे परमात्मा को बहुत कम कोई देख पाता है।


उपस्थिति में गहरे प्रभाव होंगे, मृत्यु के साथ जीना सीख लीजिए। निर्विकल्प स्वीकार, अभय कुछ भी कभी भी छीन नहीं सकता है। जो छिन सकता है वो जल्दी ही छीन जाए, तो बहुत ही शुभ है। निर्भयता में जो है जैसा भी है, उसका निर्विकल्प स्वीकार क्या है, इस प्रश्न के साथ चलते रहिए।

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Ashu Shinghal

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