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अमोघ कला: जीवन का सत्य - ध्यानशाला भोर का सत्र, 25 मार्च 2024

ध्यानशाला भोर का सत्र, 25 मार्च 2024


यहां ऐसे शुरू करते हैं जैसे अभी तक कुछ भी नहीं सीखा है, जैसे पहली बार शुरू से इस कीमिया को अवसर दिया जा रहा है।


पहली बात है कि जीवन में दुख है, और तथाकथित रूप से जिसको हम सुख समझते हैं वह भी वास्तव में दुख ही है। और दूसरी बात है कि जीवन में मेरी अपनी एक अलग पहचान होना एक झांसा है। जिसे सुख या दुख मिलता है, जो यह समझता है कि मुझे जीवन मिला हुआ है, वही एक झांसा है।


मृत्यु आने पर रुपया, रिश्ते आदि सब चूक जाते हैं। क्या ऐसी कोई कीमिया है जिससे चूक ना हो, जो कभी ना चुके, जो अमोघ हो?


जहां पर झांसा है वहीं पर ऐसा जीवन भी संभव है, जो प्रसाद है। पीड़ा या शोक वहां पर संकलित हो गई है, जहां पर प्रसाद की जगह है। जब रुपया, संस्था, आग्रह जीता है हमारे अंदर, तो हम वही हैं, जो की एक बवंडर की तरह है। ऐसा भी हो सकता है कि जो बवंडर है वो अपने को देखने में समर्थ है, इसलिए वह बवंडर एक झूठ है, हम यह नहीं जान पाते हैं।


जैसे ही हम किसी को नाम देते हैं, वैसे ही उससे जुड़ी कोई फैकल्टी सक्रिय हो जाती है। आध्यात्मिक ज्ञान से तो बहुत सावधान रहिए।


वह अमोघ कला क्या है, जिससे शोक का पूर्ण विलय हो जाए?


भावनाओं में बह कर कुछ करते रहने से कुछ नहीं होता, जीवन एक सनातन धर्म या नियम है।

यमराज ने एक व्यक्ति से प्रसन्न होकर के कहा कि तुम्हारे पास 5 मिनट का समय है, तुम जो भी चाहते हो वह हो जाएगा और यह कॉपी है इसमें तुम वो लिख सकते हो कि तुम क्या चाहते हो। जैसे ही उस व्यक्ति ने वह कॉपी पलटी तो उसमें लिखा देखा कि पड़ोसी की उन्नति हो गई है, तो उसने नीचे लिख दिया कि उसकी उन्नति ना हो, ऐसे ही वह दूसरों के लिए नकारात्मक लिखता चला गया। जब अंतिम पृष्ठ आया तो वहां पर उसके बारे में कुछ लिखा हुआ था, पर जैसे ही उसने लिखना शुरू किया, तो यमराज ने उसका हाथ पकड़ लिया, कि तुम्हारा समय समाप्त हो गया है।


इस कहानी को यदि आगे बढ़ाते हैं, और अगर आप अपने लिए भी कुछ लिखते हो, तो वास्तव में आप गैर के लिए ही लिख रहे हैं। जैसे आप लिख सकते हैं कि मेरी उन्नति हो, तो वास्तव में आप ऐसा इसलिए चाह रहे हैं ताकि आप दूसरों से ऊंचा बना सकें। झांसा अपने के माध्यम से ही बना हुआ है।


अभी आपके पास क्या है? अभी आपकी वैधता ही क्या है, कैसे कोई विचार ओरिजनल या नैसर्गिक है, जो बदलता नहीं है? आपके अतिरिक्त कोई अन्य आपको इस मसले से उबार ही नहीं सकता है।

हम जो अपने बारे में लिखते हैं वो एक बड़ा झांसा है, हमारे भंग होने पर उसका प्रदुर्भव संभव है, जिसके लिए यह जीवन सम्यक है।


कीमिया है कि जो भी आप हैं जैसे भी अभी हैं, उसे बिना तिल भर भी बदले, उपस्थित रहना। इस उपस्थिति में ही जीवन से सुख, दुख, झांसा, आप का अपना होना ही समाप्त हो जायेगा। यह एक अमोघ कला है।


आप कुछ करते हैं तब आप बनते हैं। जब मैं रूपी अभिशाप का अंत होता है, प्रसाद वहां पहले से ही पाया जाता है। मैं एक धोखा है, उसका अंत ही प्रसाद है।


इस तरह देखने से चित्त बहुत तेजी से बदलता है, और एक नया झांसा खड़ा कर देता है, जैसे कि मैं अब एक बहुत आध्यात्मिक व्यक्ति बन गया हूं।


जो भी आप हैं, जैसे हैं उसको यथावत देखें, उसके साथ निष्ठा पूर्व बने रहें। मैं की संस्था कुछ करने में बड़ी कुशल है। जो है उसको जस का तस अटेंड करना, यही अमोघ कीमिया है।


किसीने लिखा है कि अवसाद जीवन का एक ढंग है। यह बड़ी नासमझी की बात है, इससे ऐसा लगता है कि जैसे जीवन से प्रसाद समाप्त हो गया है। अस्तित्व सम्मोहन नहीं है, हम आप सम्मोहन हैं।


क्या आपका जो भी अभी का तथ्य है, आप उसके साथ बिना कोई छेड़छाड़ किए, केवल उपस्थित रह सकते हैं?


आप तभी बनते हो जब आप छेड़छाड़ करते हो, जब आप छेड़छाड़ नहीं करते हो तो बचता वही है, जो प्रसाद है।


कौन चुनता है और किस धरातल पर चुना जा रहा है? एक जीवन है और एक उसके समानांतर आभासीयता गतिमान होती है, सभी आभासीयता सूचना के ही आधार पर बनती है। नाम के आधार पर प्राण को कैसे तय कर सकते हैं? जब उपस्थिति मात्र है तो जो आभासीय सत्ता है, उसमें गति रुक जाती है।


चुनने वाले से सूचना संकलित होती है और सूचना चुनने वाले को बनाती है, ये दोनों एक ही बात हैं। यदि सूचना या नाम को हटा दिया गया, तो क्या बचा? केवल जीवन ही बचा रह गया। नाम या चित्त ही अखंड को दो में विभाजित करता है।


बिना खुद को जरा सा भी फेर बदल किए, यदि आप केवल उपस्थित हैं, तो चाहे आप अपने को पतित समझ रहे हों, या पावन समझ रहे हों, उसका कुछ मतलब नहीं रह जाता है, आप उससे कुछ छेड़छाड़ नहीं करेंगे। और साथ ही आप किसी को अच्छा या बुरा भी नहीं ठहराएंगे। इससे यहीं इसी क्षण महा प्रसाद सम्मुख उपलब्ध है।

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Ashu Shinghal

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