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प्रेम: जीवन का आधार (सांझ का सत्र, 23 जनवरी 2024)

सांझ का सत्र, 23 जनवरी 2024


प्रश्न - जीवन में दुर्भाग्य क्या है?


बिना प्रेम के जीना, इससे बड़ा कोई दुर्भाग्य नहीं है, पर कभी कभार ही कोई प्रेम को जी पाता है।

जेहि घट प्रेम न सँचरै, सो घट जानि मसान।।

जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान।।


अर्थ - जिस मनुष्य के हृदय में प्रेम की लगन नहीं है, उसका हृदय श्मशान के सदृश सूना है और वह स्वयं जीते जी मृतक समान है। जिस प्रकार लोहार की धोंकनी निर्जीव खाल होने पर भी साँस लेती है। वैसे ही प्रेम से हीन मनुष्य भी देखने में निस्सन्देह साँस लेता, चलता फिरता और काम काज करता दिखायी देता है; किन्तु यथार्थतः वह मृतक ही है।


प्रेम की किसको पड़ी है, कौन प्रेम के लिए जीवन को दांव पर लगाएगा। कुछ मिला है कुछ नहीं मिला है, बस यही हिसाब किताब चलता रहता है।


छाती और लुहार की धोंकनी में अंतर क्या है, दोनों सांस ले रहे हैं। जो खोपड़ी में भरा है वो सच नहीं है, क्या असल जिंदगी में प्रेम है? प्रेम का ना होना एकमात्र दुर्भाग्य है, सीधी जस की तस बात है कि आप हो तो प्रेम नहीं है, इस सच को पूरी ईमानदारी से देखिए।


जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाही।

सब अँधियारा मिट गया, जब दीपक देखा माही।।


कबीर दास जी कहते हैं कि जब मेरे अंदर अहंकार था, तब हृदय में हरी का वास नहीं था। और अब हृदय में हरी का वास है तो अहंकार नहीं है। जब से मैंने गुरु रूपी दीपक को पाया है तब से मेरे अंदर का अंधकार खत्म हो गया है।


कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाँहि।

सीस उतारै हाथि करि, सो पैठे घर माँहि॥


परमात्मा का घर तो प्रेम का है, यह मौसी का घर नहीं है जहाँ मनचाहा प्रवेश मिल जाए। जो साधक अपने सीस को उतार कर अपने हाथ में ले लेता है वही इस घर में प्रवेश पा सकता है।


यही मौलिक आत्म अवलोकन है, आप हो तो प्रेम नहीं है, प्रेम होगा तो आप नहीं होगे। आपको पूरा का पूरा बुझना पड़ेगा, यही निर्वाण है। अंत के साथ जीना क्या है, जरा सा भी हिलिए नहीं और हर क्षण पूरा का पूरा मिट जाइए।


विचार यानी प्रेम से वंचित होना है, जो भी अपनी प्रकट है, उसके प्रति ईमानदारी से जागे रहिए। मैं बना हुआ हूं तो प्रेम नहीं है, फिर अपने को धोखा मत दीजिए, अध्यात्म का चोला मत पहनिए।

साधु ने एक सम्राट का सत्कार नहीं किया, साधु ने कहा कि यदि बढ़ा छोटा है तो बोध कहां हुआ। अपना पराया यानी क्या, फर्क है तो बोध नहीं हुआ है।


जहां प्रेम तहां नेम नहीं, तहां न बुद्धि व्यवहार।

प्रेम मगन जब मन भया, कौन गिने तिथि वार॥


प्रेम में कोई नियम नहीं होता है। यदि प्रेम नहीं है तो विचारों की ओस चाटने वाली बात है। चालबाजी या धंधेबाजी है तो प्रेम को दांव पर लगाकर क्या मिलेगा। ये व्यंग्य है कि सभी कुत्ते बैकुंठ चले जायेंगे तो पत्थर कौन चाटेगा। पूरा समाप्त हो जाइए, अपने को एक इंच भी मत बचाइए। प्रेम है तो कौन हिसाब रखेगा? आपका बने रहना ही बड़े से बड़ा दुर्भाग्य है।


प्रश्न: अवलोकन कर्ता ही, अवलोकन में आने वाली वस्तु कैसे है?


अवलोकन कहां पर हो रहा है, घटना कहां घट रही है, दृष्टा कहां है? दृष्टा, दृश्य यहीं है, दर्शन यहीं है, सब कुछ ही एक जगह पर है। सब कुछ एक ही परदे पर घट रहा है। परदे पर ही हीरो है, विलन है, और उसको देखकर आपको दुख सुख हो रहा है। जो परदे पर हो रहा है उससे बाहर आना होगा, परदे मात्र को देखना होगा। आप सोचते हैं विलन को कर्म का फल तो मिलेगा ही। इस पूरी संरचना को एक साथ देखना क्या है? यदि आप सिर्फ हीरो को बाहर लेकर आए, तो क्या आप कभी मूवी से बाहर आ पाओगे।


मन में जो कुछ भी चल रहा है, इस पूरे क्रियाकलाप से बाहर आना पड़ेगा, यह एक मुस्त घटना है, मैं है तो सारी घटना है। एक साथ सारी मूवी घटती नहीं है; दृश्य एक ही है, आप सत्य की बुद्धि से देखते हैं या मिथ्या की बुद्धि से देखते हैं। सारे किर्यकलाप को एक साथ देखना पड़ेगा, कुछ भी बचाया तो मूवी से बाहर नहीं आ पाओगे।


जो भी घट रहा है वो एक ही घटना है, वो अवलोकन क्या है जो अवलोकन करने वाले से मुक्त है? यह प्रश्न पूछने से ही प्रेम में डुबकी लग गई, अपने को बिलकुल भी बचाने का प्रयास मत कीजिए, कुछ भी बचाया तो बड़ा धोखा हो जाएगा।


प्रश्न: मैं का एहसास कैसे संस्कारित है?


विचार यानी जो चलता है, जो घूमता रहता है। आप कुछ भी पूछिए झट से उत्तर आ जाता है, जो शब्दों छवियों में चलता है वो विचार है।


हम समझते हैं कि कोई स्त्री या पुरुष है, यह है संस्कार। आप किसी को स्त्री मानकर प्रेम कर रहे हैं तो वो काल्पनिक प्रेम है, वैसे भी जब तक आप हैं तो प्रेम कर ही नहीं सकते हैं। वैसे ही दिखता है वो संस्कार है, मैं देखता हूं ये एक विचार है। पहला संस्कार या विचार मैं का है, और सबसे अंत में मैं का विचार ही जाता है। कुछ तथाकथित अध्यात्म में या कुछ गुरुओं ने मैं को ही आत्मा समझ लिया है।


जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध।

अंधा−अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़ंत॥


जिसका गुरु अँधा अर्थात् ज्ञान−हीन है, जिसकी अपनी कोई चिंतन दृष्टि नहीं है और परंपरागत मान्यताओं तथा विचारों की सार्थकता को जाँचने−परखने की क्षमता नहीं है; ऐसे गुरु का अनुयायी तो निपट दृष्टिहीन होता है। उसमें अच्छे-बुरे, हित-अहित को समझने की शक्ति नहीं होती, जबकि हित-अहित की पहचान पशु-पक्षी भी कर लेते हैं। इस तरह अँधे गुरु के द्वारा ठेला जाता हुआ शिष्य आगे नहीं बढ़ पाता। वे दोनों एक-दूसरे को ठेलते हुए कुएँ मे गिर जाते हैं अर्थात् अज्ञान के गर्त में गिर कर नष्ट हो जाते हैं।


आप अधिकतम मित्र की तरह साथ साथ चलिए, गुरु की तो बात ही नहीं उठाइए।


पहला संस्कार मैं का है, आत्मा ना मैं है, ना तू है। जिसने पहली बार अहम ब्रह्मास्मी कहा उनकी दशा कुछ और रही होगी, वो काठी के बरतन की तरह है, उस हांडी में कितनी बार दाल बनाओगे? जीवन प्रेम से रिक्त है और आप आत्म ज्ञानी हो, ये कितनी बड़ी विडंबना है।


प्रश्न: आपसे हम सीख रहे हैं, तो आप गुरु कैसे नहीं हुए?


आप मेरे बारे में छवि बना रहे हैं तो सीखना नहीं हो रहा है। हम सीख रहे हैं कि छवि से मुक्त जीना क्या है, और आप मेरे ही बारे में छवि बना रहे हो। छवि बनाकर क्या आप मुझे फुसलाओगे। कृतज्ञता का भाव यदि है तो वो सकल अस्तित्व में डूब जाता है। छवि बनाने से प्रेम का स्रोत बाधित होता है। आपकी साधना या अन्वेषण, सदा मुझसे मुक्त है; ना मैं आपको डुबाऊं, ना आप मुझपर निर्भर होइए। कृतज्ञता मुझे क्यों देते हो किसी को भी दे दीजिए। आप मेरे बारे में जो भी सोचोगे वो एक छवि ही होगी, किसी की भी छवि से सर्वदा मुक्त रहिए।


अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को ही दे।


अर्थ: इस कहावत का अर्थ है कि एक अंधा व्यक्ति रेवड़ी बांट रहा है, लेकिन बार-बार अनजाने में खुद को ही दे रहा है। यह उन परिस्थितियों को दर्शाता है जहाँ निर्णय लेने वाले की अज्ञानता या पक्षपात के कारण अन्याय होता है।


ना मान मिलने की कोई अभिलाषा है, ना कोई मान देने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं है कि बुरे अधिक हैं, बस आप खड़े हो जाइए, अपनी बात लेकर मौजूद रहिए, कुछ लुका छिपा ना हो; कुछ कुछ इससे बाकी भी समझने लगेंगे।


कबीर साहब जब गुरु की महिमा गाते हैं, यानी कबीर साहब जब बोलते हैं तो वहां कोई व्यक्ति नहीं है, उनको गौर से देखिए जरा। हम जो हैं उनको कुछ भी बनाकर, अपनी ही मान्यताएं, कबीर साहब पर थोप देते हैं।


कबीर को कोट करना यानी पूरा मरना होगा, पारे की तरह हैं वो, पकड़ में नहीं आएंगे। कबीर साहब सीमित नहीं हैं वो बहुत विराट हैं। यदि प्रेम उतर गया जीवन में, तो आपको ध्यान साधने की जरूरत थोड़े ही पड़ेगी। मैं रूपी एक विषेले नाग के साथ हम पूरा जीवन जी रहे हैं।


यह सत्र सुना और यहीं पर सब समाप्त, जितना भी समझा जाना था वो हो गया। क्या हमारा हर संवाद इस तरह परिपूर्ण हो सकता है?


हमने भ्रम के कारण मैं को ही जीवन समझ लिया गया है, अब इसमें कोई संदेह नहीं रखिए, इसको दांत लगाकर पकड़े रहिए।

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Ashu Shinghal

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