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संबंधों का खेल: जिम्मेदारी और स्वतंत्रता (सांझ का सत्र, 10 जनवरी 2024)

सांझ का सत्र, 10 जनवरी 2024


प्रश्न - किस भय से आप गुरु की छवि में उतरना नहीं चाहते हैं? कहीं आप जिम्मेदारी लेने से बचते तो नहीं हैं?


अखंड जिम्मेदारी यानी क्या? किसी के अनुकूल आप बनना चाहते हैं, या किसी को अपने अनुकूल बनाना चाहते हैं, कहां पहुंचा यह प्रबंधन? किसी के अनुकूल बनने से थोड़ी देर के लिए किसी एक संबंध में रस बढ़ सकता है, लेकिन क्या आप बहुत लोगों के प्रतिकूल नहीं हो जाते हैं? क्या आपकी जिम्मेदारी सीमित नहीं हो गई, किसी भी ओढ़ी गई जिम्मेदारी की वैधता भी क्या है?


अतीत में जिन्होंने बहुत बड़ी जिम्मेदारीयां लीं भी समाज को सुधारने की, वो बहुत दूर तक बात गई नहीं। हम आंशिक जिम्मेदारी ही ले पाते हैं वो भी जो ज्ञात है, परिपूर्णता की जिम्मेदारी क्या है?


गैर जिम्मेदारी कहां से शुरू होती है? मैं के ठोस होने से ही गैर जिम्मेदाराना व्यवहार शुरू होता है। दो ही संभावनाएं हैं, एक है मैं की संभावना या दूसरा है मैं के बिना होश की संभावना। जागरण को अवसर देना, मैं की गति को बिना देखने वाले के देखने की कला को, जीवन में उतरने का अवसर देना, एक बड़ी जिम्मेदारी है।


यह व्यक्ति नैसर्गिक जागरण को अवसर दिए हुए है। आपका अधिकतम क्या छीन सकता है, जहां कुछ छीन रहा है क्या वहां ही जागरण को अवसर दिया जा सकता है? फिर डर कैसे होगा, डरता वो है जिसके पास कुछ हो छीनने के लिए। सबसे बड़ा भय क्या है, बदनामी का भी भय क्यों है? क्या उस स्थिति में जागरण को अवसर नहीं दिया जा सकता है? यदि कुछ प्रेम का प्रसाद जीवन में उतरा है, तो क्या किसी से कभी भी कोई भी प्रसाद, छीना जा सकता है?


यहां केवल खेल चलता है, मित्रता का या बैर का, लोभ का या ईर्ष्या का, प्रशंसा का या निंदा का।

हम आप जब साथ साथ चल रहे हैं तो बेशर्त मुक्ति का साथ है, हम आप एक दूसरे से बेशर्त मुक्त हैं। आपको मुक्त रखने के लिए मुझे सदा मुक्त रहना होगा, यदि मैं किसी छवि में बंधा तो मैं दूसरों को भी अवश्य ही बांधूंगा। इस तरह से जीना एक गुरु से बड़ी जिम्मेदारी को अवसर देना है।


प्रश्र - क्या मां बेटे में एक नैसर्गिक संबंध नहीं होता है?


हम यहां जो भी बात कह रहे हैं, वो एक परिपक्वता के बाद बात कर रहे हैं। क्या किसी भी संबंध का आधार बुद्धि, मन या विचार नहीं है? विचारों से संबंध को दोहराने से वो गहरा जाता है। पर मैं आपसे प्रेम करता हूं, इसको बार बार कह कर दोहराने की जरूरत ही क्या है?


अभी गोवा में एक घटना सामने आई है जिसमें एक पत्नी को अपने पति से इतनी घृणा थी कि उसको जीवन में कुछ सुख ना मिले और इस कारणवश एक मां ने अपने ही बच्चे की हत्या कर दी। यह एक बहुत बड़ी विकृत घटना है। पर क्या हमारे संबंधों में ईर्ष्या, बैर, लोभ आदि नहीं पाए जाते हैं?


जब एक प्राकृतिक घटना का सहारा लेकर प्रेम की दुहाई दी जाती है, तो क्या बाकी संबंधों से हम उखड़ नहीं जाते हैं? क्या हर संबंध में हम पहले से ही उखड़े हुए ही नहीं हैं? जब भी हम किसी भी नग्न सत्य को जस का तस देखते हैं, तो पारमार्थिक सत्य की ओर बढ़ने लगते हैं। नैसर्गिक संबंध को हम जानते ही कहां है और जान ही नहीं सकते हैं, नैसर्गिक संबंध का दूसरा नाम ही जीवन है।


किसी भी सीमित संबंध में जीवन विराट प्रसाद से वंचित हो जाता है। यह पत्नी या पति है, किसी को भी मेरा मेरा बार बार दोहराने से वो ठोस रूप ले लेता है, यह एक तरह का आत्म सम्मोहन है। जैसे कभी किसी को सम्मोहन के वश में करके कुछ जादूगर उससे कुछ भी करा सकते हैं।


संबंध के नाम पर केवल छवियां ही तो नजर आती हैं। आखिर छवियों की बैसाखियों पर हमारे संबंध क्यों टिके हुए हैं? संबंध प्रेम का दूसरा स्वरूप होता है, जहां विचार का हस्तक्षेप नहीं है।


यहां किसी को पकड़ने या छोड़ने की बात नहीं है, क्या हम हर तरह के ढर्रे से मुक्त हो सकते हैं? तब प्रेम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, प्रेम रोएं रोएं से उपजेगा। यहां निराशा जैसी बात नहीं है, मां के साथ या कोई भी संबंध हमने जाना ही नहीं है कि असली संबंधित कैसे हुआ जाता है? जब प्रेम उतरेगा तो पहली बार पता चलेगा की असली संबंधित होना यानी क्या।


जीवन में पकड़ने जैसा है ही क्या? केवल रिकॉर्डिंग्स इकठ्ठी करी जा रही हैं, जो जाता है वो चला जाए तो ही अच्छा है। जितना चला जाए उतना ही नाचिए, केवल तथाकथित सुख देने वाली वस्तुएं ही नहीं जायेंगी, शोक भी जायेगा। किसी भी चीज के लिए, विराट को छोड़ना नुकसान का सौदा हो जायेगा। धीरे धीरे हो सकता है आप अपने से ही पूछेंगे, अब दुखी क्यों नहीं होता हूं, अब चिंता क्यों नहीं होती है?


जो अपने से हो और हमको पता ही नहीं चले, वही सर्वश्रेष्ठ है। बहुत भाग लिए, अब ठहर जाइए। जो भी हमने सारी जानकारी इकट्ठी कर रखीं हैं, वही तो पोंछनी हैं। प्रेम या जागरण में जो भी असंतुलित है वो अपने से उत्तम रूप से संतुलन में आ जाता है।


एक बार हिम्मत कर के कूद ही जाना, "मेरी मर्जी पूरी हो" से "तेरी मर्जी पूरी हो", अध्यात्म बस इतना सा ही तो है। सुनने वाले के बिना सुनना क्या है? बस एक एहसास होता है कि बस एक एहसास है तू। यदि हमारे बीच में नेक्स्ट पार्टिसिपेंट यदि परमात्मा है, तो सबमें सबसे ज्यादा वही तो शामिल होता है। "शब्द हैं तो हम हैं" ये भी एक बड़ा भ्रम है, यानी जीवन कहीं खोता जा रहा है।


एक होता है जीवेष्णा यानी जीने की इच्छा, और एक होता है मृत्येष्णा यानी जब जीने की इच्छा समाप्त होने लगती है। प्रेम इन दोनों में ही नहीं है। कुछ जीवों जैसे चींटियों में इनका संतुलन होता है, और वो खुद को समाप्त कर देते हैं ताकि समूह बना रहे।


प्रेम की बात भौतिक सर्वाइवल या उत्तरजीविता के पार चली जाती है। बिना विचार के संबंध क्या है, ये किसी भी रिश्ते में नहीं जाना जा सकता है। हम भी समुदाय बना कर रखना चाहता है, यह सब बहुत


पुरानी स्मृति से आ रहा है।

मन मस्त हुआ तब क्यों बोले।

हीरा पायो गांठ गठियायो,

बारबार बाको क्यों खोले।

हलकी थी तब चढ़ी तराजू,

पूरी भई तब क्यों तोले।।

सुरत कलारी भई मतवारी,

मदवा पी गई बिन तोले।

हंसा पाये मानसरोवर,

तालत्तलैया क्यों डोले।।

तेरा साहब है घर मांही,

बाहर नैना क्यों खोले।

कहै कबीर सुनो भाई साधो,

साहब मिल गए तिल ओले।।


मन मस्त हो गया तो अब बोलने की क्या ज़रूरत है। जब हीरा मिल गया और उसे गाँठ में बाँध लिया तो बार-बार उसे खोलकर देखने से क्या फ़ाइदा। जब तराज़ू हलकी थी तो उसका पलड़ा ऊपर था, अब तराज़ू भरी हुई है तो तौलना बेकार है। होश में डूबी, प्रेम की मारी शराब बेचने वाली ऐसी मस्त हुई, कि वो बिना नापे तौले मदिरा पी गई।


हंस को मानसरोवर मिल गया अब वो तालाबों का चक्कर क्यों लगाए। जब तेरा मालिक (साहब) घर ही में है, तो बाहर आँखें खोलने से क्या मिलेगा। सुनो भाई साधु, 'कबीर' कहते हैं कि मेरा साहब (प्रभु) जो तिल की ओट में छुपा हुआ था मुझे मिल गया है।


मन मस्त हुआ तो क्यों बोले। मानसरोवर मिल गया तो ताल तलैया की क्या जरूरत रह जायेगी? असली धन मिल गया तो नकली धन से पकड़ छूटनी शुरू हो गई। आपको खुद पर ही आश्चर्य होगा कि अब किसी से बैर क्यों नहीं होता? जब तराजू हल्की थी तो ऊपर चढ़ी रहती थी, कि थोड़ा मान सम्मान मिल जाए, ये सब हीन भावना के लक्षण हैं। अब इन सबमें कोई रुचि नहीं रही।


कोई केवल गुड़ खाए और कोई खाने के बाद उसकी बड़ी सुंदर व्याख्या कर दे, स्वाद तो उतना ही आयेगा। किसी में कुछ भाषा का कौशल हो सकता है, पर मौलिक समझ, प्रेम या होश से उसका कोई लेना देना नहीं है। जीवन में थोड़ा भी जागना या बेफिक्री आना बहुत शुभ लक्षण है।


यदि किसी रिश्ते में भय है और आप चाह कर भी उसको हटाने के लिए कुछ कर नहीं सकते हैं, तो वहां बस उनके साथ प्रेम के साथ उपस्थित रहिए। प्रेम ही सबसे उत्तम साधन है। सब कुछ अंतर्संबंधित है, सबसे बासी तो मैं का विचार है। आप बस प्रेम में उपस्थित रहिए, आप जागते चलिए जिसको समझ आए तो अच्छा है, नहीं आए तो भी आप कुछ नहीं कर सकते हैं। किसी को उसकी इच्छा के बिना, कुछ घोट घोट कर समझना, भी एक हिंसा ही है। अपना रास्ता बनाइए प्रेम के उतरने के लिए, उसमें कुछ घटता है तो घट जाए।


हमें खुद नहीं पता है कि हम कितनी परतों में जीते हैं, उसकी वजह से ही समस्या होती है। आपकी गहरी उपस्थिति ही बहुत है, जहां कुछ और काम नहीं आए, प्रेम या होश ही वहां काम कर सकता है, प्रेम परतों में और उनके भी पार पहुंच जाता है। जब होश होता है तो मन कुछ ठिठक ठिठक के कहता है, अब ठिठक जाता है कुछ कहते हुए की ये भला मैंने किया है।

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Ashu Shinghal

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