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तीन उधार

Feb 2, 2024
1 min read

जगत में मेरे

तीन उधार बाक़ी हैं

साँझ अरुणाचला के उस पाहन से

जिसने स्वप्न में मुझे अडोल स्पर्श दिया है

भोर ओस की पहली झिलमिल से

जिसने जागृति में मुझे दर्शन दिया है

और मध्य रात्रि हरसिंगार की पत्तियों पर से सरककर झरे

उसके ही फूलों से

जिसने मुझे सुषुप्ति में सुनना सिखाया है


                               धर्मराज

                        01/02/2024

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