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प्रेम माटी

Aug 7, 2021
1 min read


अनगिनत चरणों में शीश धरकर

भी अधूरे छूटे मेरे प्रणाम

आज अपने चरणों के प्रणाम से

पूरे हो चले हैं

इन नयनों से तो कितना कुछ शुभ अशुभ मैंने नहीं देखा

फिर भी मेरा दर्शन सदा खंडित ही रहा

अपने दर्शन को पाकर

आज मेरे सारे खंडित दर्शन पूरे हो चले हैं

नित नए नए परिचयों में उतरकर भी

मैं सदा अकेला अपरिचित ही रहा

स्वयं की जरा सी भनक से ही सारे परिचित अपरिचित

आत्मवत हो चले हैं

बैरंग लौटे असंख्य प्रेम निवेदन भेजे थे मैंने

जब जीवन प्रेम से सूना था

मैं उसी प्रेम माटी का भांडा हूँ

जिससे ये सकल अस्तित्व का खेल बनता बिगड़ता है

यह बूझ सब दिशाओं से

प्रेम के नव नव झरने

मेरी ओर अनायास उमड़ चले हैं


धर्मराज

14/08/2020


 
 
 

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