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पकती कविता

Apr 23, 2023
1 min read

ऐसा लगता है

जैसे जैसे कविता परिपक्व होती है

वह जीवित होती जाती है

उस से उलाहनें और शिकायतें विदा होने लगती हैं

उस से कवि विदा होने लगता है

कभी आता है तो प्रार्थना में बस औपचारिक पात्र की तरह

ऐसा लगता है

जैसे जैसे कविता परिपक्व होती है

उसमें प्रसाद उतरने लगता है

वह नृत्य सी करती है

अतुकांत होकर भी वह जैसे गाई जा रही होती है

सम्यक् हृदय की भूमि पाकर

पकती हुई कविता

कवि के व्यक्तित्व को आत्मसात् कर लेती है

कवि कविता हो जाता है

वह कविता जो अव्यक्त सौंदर्यबोध में है

जो कलरव के अविनाशी संगीत में है


धर्मराज

15 March 2023


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