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प्रेम ने जब इंसान कविता रची

Apr 23, 2023
1 min read


प्रेम ने जब इंसान कविता रची

तो मुक्ति का कागद चुना

महोत्सव की स्याही से

उसने पहला आखर आँख रचा

वह आँख जो बाहर अच्छा बुरा ही नहीं

चाहे तो भीतर भी

अपने सिरजनहार को निहार सकती है

उसने कान रचे

जो बाहर के गीत या कोलाहल तो सुन ही सकते हैं

चाहें तो भीतर मुक्ति के कागद से गुथा

मौन संगीत भी सुन सकते हैं

उसने कंठ रचा

जो कभी न आने वाले परदेव को पुकार सकते हैं

चाहे तो भीतर सदा सर्वदा विराजमान आत्मदेव को

भेंट भी सकते हैं

उसने पाँव रचे जो महत्व की दौड़ में

अंतहीन गोल घूम सकते हैं

चाहे तो अपने सृष्टा में डूबने का माध्यम भी बन सकते हैं

हाथ रचे जो फूलों की पंखुरियों को छू सकते हैं

चाहे तो जिसने हाथों को रचा ही हुआ है उसे

महसूस कर सकते हैं

उसने हाव रचे भाव रचे भंगिमाएँ रचीं

मन रचा समय रचा

जीवन रचा मृत्यु रची

उसने मैं का मायावी अहसास रचा

यह मैं जो अपने हर हाव से भाव से

भंगिमाओं से

मन की पींगों से स्वयं को पुष्ट करता है

यह मैं जो जीवन को जन्म और मृत्यु के झाँसें में देखता है

यह मैं जो जन्म से हर्ष और मृत्यु से विषाद रखता है

और चाहे तो यह मैं स्वयं की मायावी वृत्ति प्रवृत्ति समझकर

अपने विसर्जन में

प्रेम से प्रेम पर रची कविता को

प्रेम में ही समाधि दे सकता है


धर्मराज

10 February 2023


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